leela
गोवर्धन लीला
Govardhan Leela
श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों को इंद्र-यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा का परामर्श दिया। अपमानित इंद्र ने प्रलयंकारी वर्षा की। तब भगवान ने गोवर्धन पर्वत को कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर सात दिनों तक व्रज की रक्षा की। अंततः इंद्र ने क्षमा माँगी और उन्हें "गोविंद" कहकर अभिषेक किया।
कथा
व्रज में प्रतिवर्ष इंद्र-यज्ञ की तैयारी होती थी। एक वर्ष बालक श्रीकृष्ण ने नंद महाराज तथा गोपों से पूछा कि यह यज्ञ किसके लिए है। उत्तर मिला — वर्षा के लिए, जिससे घास उगे और गौएँ पुष्ट हों। श्रीकृष्ण ने कहा कि व्रज का जीवन प्रत्यक्ष रूप से गोवर्धन पर्वत और गौओं पर आधारित है — पर्वत से घास, जल, औषधि और आश्रय मिलता है। अतः पूजा उनकी होनी चाहिए जो प्रत्यक्ष उपकार करते हैं। गोपों ने यह बात स्वीकार की और गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट का आयोजन हुआ। इंद्र इसे अपना अपमान मानकर क्रुद्ध हुए। उन्होंने संवर्तक मेघों को आदेश दिया और व्रज पर प्रलय जैसी वर्षा आरंभ हो गई। वज्रपात, आँधी और जलधारा से व्रजवासी, गौएँ और बछड़े व्याकुल हो उठे। वे सब श्रीकृष्ण की शरण में आए। तब सात वर्ष के बालक श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी बाईं हाथ की कनिष्ठा अंगुली पर उठा लिया और कहा — "सब इसके नीचे आ जाओ, अपनी गौओं सहित।" सम्पूर्ण व्रज पर्वत के नीचे सुरक्षित हो गया। सात दिन तक वर्षा होती रही और सात दिन तक भगवान पर्वत उठाए खड़े रहे — न थके, न हटे। व्रजवासी उन्हें एकटक देखते रहे; उनकी भूख-प्यास भी भगवान के दर्शन में विलीन हो गई। आठवें दिन इंद्र का बल क्षीण हो गया और वर्षा थम गई। भगवान ने पर्वत को यथास्थान रख दिया और सबको सुरक्षित बाहर निकाला। इंद्र को अपनी भूल का बोध हुआ। वे व्रज आए, भगवान के चरणों में नत हुए और क्षमा माँगी। उन्होंने कामधेनु सहित श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें "गोविंद" नाम से संबोधित किया — गौओं तथा इंद्रियों के स्वामी।
सरल रूप
श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों से कहा कि इंद्र के स्थान पर गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा करें, क्योंकि वही प्रत्यक्ष उपकारी हैं। इससे क्रुद्ध होकर इंद्र ने भारी वर्षा की। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पर उठाकर सात दिन तक सबकी रक्षा की। अंत में इंद्र ने क्षमा माँगी और उन्हें "गोविंद" कहकर अभिषेक किया।
बच्चों के लिए
हर साल व्रज के लोग इंद्र देवता की पूजा करते थे, ताकि अच्छी बारिश हो। एक बार छोटे कृष्ण ने पूछा, "हमें घास कौन देता है? पानी कहाँ से आता है? हमारी गायें कहाँ चरती हैं?" सबने कहा, "गोवर्धन पर्वत से!" कृष्ण बोले, "तो हमें गोवर्धन और अपनी गायों की पूजा करनी चाहिए।" सबने मानकर गोवर्धन की पूजा की और बहुत सारा भोजन बनाया — जिसे अन्नकूट कहते हैं। यह देखकर इंद्र देवता नाराज़ हो गए। उन्होंने इतनी ज़ोर की बारिश भेजी कि चारों ओर पानी भर गया। लोग और गायें डरकर काँपने लगे। तब सात साल के नन्हे कृष्ण आगे बढ़े। उन्होंने पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठा लिया — जैसे कोई छाता उठाता हो! उन्होंने कहा, "सब लोग अंदर आ जाओ, अपनी गायों के साथ।" सात दिन तक बारिश होती रही और सात दिन तक कृष्ण पहाड़ उठाए खड़े रहे। किसी को एक बूँद भी नहीं लगी। आख़िर इंद्र समझ गए कि उन्होंने ग़लती की। वे नीचे आए और कृष्ण से माफ़ी माँगी। उन्होंने कृष्ण को एक सुंदर नाम दिया — "गोविंद"।
सार
व्रज के समस्त निवासी और गौएँ सुरक्षित रहे, इंद्र का अभिमान शांत हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण को गोविंद कहकर अभिषेक किया। गोवर्धन पूजा व्रज की वार्षिक परंपरा बन गई।
शिक्षा
सच्चा पूजन उसका है जो प्रत्यक्ष पालन करता है, और सच्ची शरण वही है जो विपत्ति में साथ न छोड़े। अभिमान चाहे देवता का ही क्यों न हो, भगवत्-कृपा के सामने टिकता नहीं।
महत्त्व
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व इसी लीला की स्मृति में मनाया जाता है और आज भी व्रज तथा सम्पूर्ण भारत में प्रचलित है। "गोविंद" नाम की उत्पत्ति इसी प्रसंग से हुई। गोवर्धन परिक्रमा व्रज की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में गिनी जाती है।
पात्र
कृष्ण
avatar
The eighth avatar of Vishnu, the cowherd of Vrindavan and the speaker of the Bhagavad Gita.
इन्द्र
deity
King of the devas, wielder of the vajra and lord of rain.
नन्द महाराज
character

