2.39श्रीकृष्ण
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।2.39।।
eṣhā te ’bhihitā sānkhye
buddhir yoge tvimāṁ śhṛiṇu
buddhyā yukto yayā pārtha
karma-bandhaṁ prahāsyasi
।।2.39।। हे पार्थ! यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन; जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर देगा।
2.48श्रीकृष्ण
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।
yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate
।।2.48।। हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
2.49श्रीकृष्ण
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।2.49।।
dūreṇa hy-avaraṁ karma buddhi-yogād dhanañjaya
buddhau śharaṇam anvichchha kṛipaṇāḥ phala-hetavaḥ
।।2.49।। बुद्धियोग-(समता) की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट है। अतः हे धनञ्जय ! तू बुद्धि (समता) का आश्रय ले; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं।
2.50श्रीकृष्ण
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।।2.50।।
buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite
tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam
।।2.50।। बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।
3.3श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।3.3।।
śhrī bhagavān uvācha
loke’smin dvi-vidhā niṣhṭhā purā proktā mayānagha
jñāna-yogena sāṅkhyānāṁ karma-yogena yoginām
।।3.3।। श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है।
3.7श्रीकृष्ण
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते।।3.7।।
yas tvindriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjuna
karmendriyaiḥ karma-yogam asaktaḥ sa viśhiṣhyate
।।3.7।। हे अर्जुन! जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर (निष्काम भावसे) समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
4.1श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।4.1।।
śhrī bhagavān uvācha
imaṁ vivasvate yogaṁ proktavān aham avyayam
vivasvān manave prāha manur ikṣhvākave ’bravīt
।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा।
4.2श्रीकृष्ण
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।।4.2।।
evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ
sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa
।।4.2।। हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया।
4.3श्रीकृष्ण
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।4.3।।
sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ
bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam
।।4.3।। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।
4.4अर्जुन
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4.4।।
arjuna uvācha
aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ
katham etad vijānīyāṁ tvam ādau proktavān iti
।।4.4।। अर्जुन बोले - आपका जन्म तो अभीका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है; अतः आपने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यसे यह योग कहा था - यह बात मैं कैसे समझूँ?
4.18श्रीकृष्ण
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।।4.18।।
karmaṇyakarma yaḥ paśhyed akarmaṇi cha karma yaḥ
sa buddhimān manuṣhyeṣhu sa yuktaḥ kṛitsna-karma-kṛit
।।4.18।। जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है।
4.25श्रीकृष्ण
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।।4.25।।
daivam evāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate
brahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati
।।4.25।। अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं।
4.27श्रीकृष्ण
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।4.27।।
sarvāṇīndriya-karmāṇi prāṇa-karmāṇi chāpare
ātma-sanyama-yogāgnau juhvati jñāna-dīpite
।।4.27।। अन्य योगीलोग सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्रियाओंको और प्राणोंकी क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं।
4.28श्रीकृष्ण
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।4.28।।
dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare
swādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ
।।4.28।। दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्य-सम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं, और दूसरे कितने ही योगयज्ञ करनेवाले हैं, तथा कितने ही स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।
4.38श्रीकृष्ण
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।4.38।।
na hi jñānena sadṛiśhaṁ pavitramiha vidyate
tatsvayaṁ yogasansiddhaḥ kālenātmani vindati
।।4.38।। इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।
4.41श्रीकृष्ण
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।।4.41।।
yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam
ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya
।।4.41।। हे धनञ्जय ! योग- (समता-) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।
4.42श्रीकृष्ण
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।
tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ
chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata
।।4.42।। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग -(समता-) में स्थित हो जा, (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।
5.1अर्जुन
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम्।।5.1।।
arjuna uvācha
sannyāsaṁ karmaṇāṁ kṛiṣhṇa punar yogaṁ cha śhansasi
yach chhreya etayor ekaṁ tan me brūhi su-niśhchitam
।।5.1।। अर्जुन बोले -- हे कृष्ण ! आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो एक निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये।
5.2श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।5.2।।
śhrī bhagavān uvācha
sannyāsaḥ karma-yogaśh cha niḥśhreyasa-karāvubhau
tayos tu karma-sannyāsāt karma-yogo viśhiṣhyate
।।5.2।। श्रीभगवान् बोले -- संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
5.4श्रीकृष्ण
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।5.4।।
sānkhya-yogau pṛithag bālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ
ekamapyāsthitaḥ samyag ubhayor vindate phalam
।।5.4।। बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है।
5.5श्रीकृष्ण
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।5.5।।
yat sānkhyaiḥ prāpyate sthānaṁ tad yogair api gamyate
ekaṁ sānkhyaṁ cha yogaṁ cha yaḥ paśhyati sa paśhyati
।।5.5।। सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही ठीक देखता है।
5.6श्रीकृष्ण
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।5.6।।
sannyāsas tu mahā-bāho duḥkham āptum ayogataḥ
yoga-yukto munir brahma na chireṇādhigachchhati
।।5.6।। परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।
5.11श्रीकृष्ण
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।5.11।।
kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api
yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṁ tyaktvātma-śhuddhaye
।।5.11।। कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।
5.14श्रीकृष्ण
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।5.14।।
na kartṛitvaṁ na karmāṇi lokasya sṛijati prabhuḥ
na karma-phala-saṅyogaṁ svabhāvas tu pravartate
।।5.14।। परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
5.23श्रीकृष्ण
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।5.23।।
śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt
kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ
।।5.23।। इस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।
5.24श्रीकृष्ण
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।5.24।।
yo 'ntaḥ-sukho 'ntar-ārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ
sa yogī brahma-nirvāṇaṁ brahma-bhūto 'dhigachchhati
।।5.24।। जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।
6.1श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।6.1।।
śhrī bhagavān uvācha
anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
।।6.1।। श्रीभगवान् बोले -- कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
6.2श्रीकृष्ण
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।6.2।।
yaṁ sannyāsam iti prāhur yogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava
na hyasannyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaśhchana
।।6.2।। हे अर्जुन ! लोग जिसको संन्यास कहते हैं, उसीको तुम योग समझो; क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता।
6.3श्रीकृष्ण
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।6.3।।
ārurukṣhor muner yogaṁ karma kāraṇam uchyate
yogārūḍhasya tasyaiva śhamaḥ kāraṇam uchyate
।।6.3।। जो योग-(समता-) में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये कर्तव्य-कर्म करना कारण कहा गया है और उसी योगारूढ़ मनुष्यका शम (शान्ति) परमात्मप्राप्तिमें कारण कहा गया है।
6.4श्रीकृष्ण
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।6.4।।
yadā hi nendriyārtheṣhu na karmasv-anuṣhajjate
sarva-saṅkalpa-sannyāsī yogārūḍhas tadochyate
।।6.4।। जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।
6.8श्रीकृष्ण
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।6.8।।
jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥ
yukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
।।6.8।। जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है -- ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।
6.10श्रीकृष्ण
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।6.10।।
yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ
ekākī yata-chittātmā nirāśhīr aparigrahaḥ
।।6.10।। भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये।
6.12श्रीकृष्ण
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।6.12।।
tatraikāgraṁ manaḥ kṛitvā yata-chittendriya-kriyaḥ
upaviśhyāsane yuñjyād yogam ātma-viśhuddhaye
।।6.12।। उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।
6.15श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।6.15।।
yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī niyata-mānasaḥ
śhantiṁ nirvāṇa-paramāṁ mat-sansthām adhigachchhati
।।6.15।। नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है।
6.16श्रीकृष्ण
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।6.16।।
nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna
।।6.16।। हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।
6.17श्रीकृष्ण
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।6.17।।
yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā
।।6.17।। दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।
6.19श्रीकृष्ण
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।6.19।।
yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā
yogino yata-chittasya yuñjato yogam ātmanaḥ
।।6.19।। जैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।
6.20श्रीकृष्ण
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।6.20।।
yatroparamate chittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā
yatra chaivātmanātmānaṁ paśhyann ātmani tuṣhyati
।।6.20।। योगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है।
6.21श्रीकृष्ण
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः।।6.21।।
sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam
vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ
।।6.21।। जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता।
6.23श्रीकृष्ण
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा।।6.23।।
taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam
sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā
।।6.23।। जिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।
6.27श्रीकृष्ण
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।6.27।।
praśhānta-manasaṁ hyenaṁ yoginaṁ sukham uttamam
upaiti śhānta-rajasaṁ brahma-bhūtam akalmaṣham
।।6.27।। जिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है।
6.28श्रीकृष्ण
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।6.28।।
yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī vigata-kalmaṣhaḥ
sukhena brahma-sansparśham atyantaṁ sukham aśhnute
।।6.28।। इस प्रकार अपने-आपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है।
6.29श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।।6.29।।
sarva-bhūta-stham ātmānaṁ sarva-bhūtāni chātmani
īkṣhate yoga-yuktātmā sarvatra sama-darśhanaḥ
।।6.29।। सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्तःकरणवाला योगा अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें देखता है।
6.31श्रीकृष्ण
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।6.31।।
sarva-bhūta-sthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvam āsthitaḥ
sarvathā vartamāno ’pi sa yogī mayi vartate
।।6.31।। मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है।
6.32श्रीकृष्ण
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः।।6.32।।
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna
sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ
।।6.32।। हे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।
6.33अर्जुन
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्।।6.33।।
arjuna uvācha
yo ’yaṁ yogas tvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana
etasyāhaṁ na paśhyāmi chañchalatvāt sthitiṁ sthirām
।।6.33।। अर्जुन बोले -- हे मधुसूदन ! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ।
6.36श्रीकृष्ण
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।6.36।।
asaṅyatātmanā yogo duṣhprāpa iti me matiḥ
vaśhyātmanā tu yatatā śhakyo ’vāptum upāyataḥ
।।6.36।। जिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है।
6.37अर्जुन
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।6.37।।
arjuna uvācha
ayatiḥ śhraddhayopeto yogāch chalita-mānasaḥ
aprāpya yoga-sansiddhiṁ kāṅ gatiṁ kṛiṣhṇa gachchhati
।।6.37।। अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है?
6.41श्रीकृष्ण
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।।6.41।।
prāpya puṇya-kṛitāṁ lokān uṣhitvā śhāśhvatīḥ samāḥ
śhuchīnāṁ śhrīmatāṁ gehe yoga-bhraṣhṭo’bhijāyate
।।6.41।। वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।
6.42श्रीकृष्ण
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।6.42।।
atha vā yoginām eva kule bhavati dhīmatām
etad dhi durlabhataraṁ loke janma yad īdṛiśham
।।6.42।। अथवा (वैराग्यवान्) योगभ्रष्ट ज्ञानवान् योगियोंके कुलमें ही जन्म लेता है। इस प्रकारका जो यह जन्म है, यह संसारमें बहुत ही दुर्लभ है।
6.44श्रीकृष्ण
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।।6.44।।
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ
jijñāsur api yogasya śhabda-brahmātivartate
।।6.44।। वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है।
6.45श्रीकृष्ण
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।।6.45।।
prayatnād yatamānas tu yogī sanśhuddha-kilbiṣhaḥ
aneka-janma-sansiddhas tato yāti parāṁ gatim
।।6.45।। परन्तु जो योगी प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है और जिसके पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो अनेक जन्मोंसे सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परमगतिको प्राप्त हो जाता है।
6.46श्रीकृष्ण
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।
tapasvibhyo ’dhiko yogī
jñānibhyo ’pi mato ’dhikaḥ
karmibhyaśh chādhiko yogī
tasmād yogī bhavārjuna
।।6.46।। (सकामभाववाले) तपस्वियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है और कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है -- ऐसा मेरा मत है। अतः हे अर्जुन ! तू योगी हो जा।
6.47श्रीकृष्ण
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः।।6.47।।
yoginām api sarveṣhāṁ mad-gatenāntar-ātmanā
śhraddhāvān bhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ
।।6.47।। सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है।
7.1श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।7.1।।
śhrī bhagavān uvācha
mayyāsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśhrayaḥ
asanśhayaṁ samagraṁ māṁ yathā jñāsyasi tach chhṛiṇu
।।7.1।। श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन।
7.25श्रीकृष्ण
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।7.25।।
nāhaṁ prakāśhaḥ sarvasya yoga-māyā-samāvṛitaḥ
mūḍho ’yaṁ nābhijānāti loko mām ajam avyayam
।।7.25।। जो मूढ़ मनुष्य मेरेको अज और अविनाशी ठीक तरहसे नहीं जानते (मानते), उन सबके सामने योगमायासे अच्छी तरहसे आवृत हुआ मैं प्रकट नहीं होता।
8.10श्रीकृष्ण
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।8.10।।
prayāṇa-kāle manasāchalena
bhaktyā yukto yoga-balena chaiva
bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak
sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam
।।8.10।। वह भक्तियुक्त मनुष्य अन्तसमयमें अचल मनसे और योगबलके द्वारा भृकुटीके मध्यमें प्राणोंको अच्छी तरहसे प्रविष्ट करके (शरीर छोड़नेपर) उस परम दिव्य पुरुषको ही प्राप्त होता है।
8.14श्रीकृष्ण
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।8.14।।
ananya-chetāḥ satataṁ yo māṁ smarati nityaśhaḥ
tasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha nitya-yuktasya yoginaḥ
।।8.14।।हे पृथानन्दन ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।
8.23श्रीकृष्ण
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।8.23।।
yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ
prayātā yānti taṁ kālaṁ vakṣhyāmi bharatarṣhabha
।।8.23।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा।
8.25श्रीकृष्ण
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।8.25।।
dhūmo rātris tathā kṛiṣhṇaḥ ṣhaṇ-māsā dakṣhiṇāyanam
tatra chāndramasaṁ jyotir yogī prāpya nivartate
।।8.25।। जिस मार्गमें धूमका अधिपति देवता, रात्रिका अधिपति देवता, कृष्णपक्षका अधिपति देवता और छः महीनोंवाले दक्षिणायनका अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर उस मार्गसे गया हुआ योगी (सकाम मनुष्य) चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है।
8.27श्रीकृष्ण
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।8.27।।
naite sṛitī pārtha jānan yogī muhyati kaśhchana
tasmāt sarveṣhu kāleṣhu yoga-yukto bhavārjuna
।।8.27।। हे पृथानन्दन ! इन दोनों मार्गोंको जाननेवाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अतः हे अर्जुन ! तू सब समयमें योगयुक्त हो जा।
8.28श्रीकृष्ण
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।8.28।।
vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva
dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam
atyeti tat sarvam idaṁ viditvā
yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam
।।8.28।। योगी इसको (शुक्ल और कृष्णमार्गके रहस्यको) जानकर वेदोंमें, यज्ञोंमें, तपोंमें तथा दानमें जो-जो पुण्यफल कहे गये हैं, उन सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है और आदिस्थान परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
9.5श्रीकृष्ण
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।
na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram
bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ
।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।
9.28श्रीकृष्ण
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।9.28।।
śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ
sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi
।।9.28।। इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा।
10.7श्रीकृष्ण
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।।10.7।।
etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥ
so ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ
।।10.7।। जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
10.10श्रीकृष्ण
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।10.10।।
teṣhāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam
dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te
।।10.10।। उन नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है।
10.17अर्जुन
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।।10.17।।
kathaṁ vidyām ahaṁ yogins tvāṁ sadā parichintayan
keṣhu keṣhu cha bhāveṣhu chintyo ’si bhagavan mayā
।।10.17।। हे योगिन् ! हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ ? और हे भगवन् ! किन-किन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ ?
10.18अर्जुन
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।।10.18।।
vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana
bhūyaḥ kathaya tṛiptir hi śhṛiṇvato nāsti me ’mṛitam
।।10.18।। हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।
11.4अर्जुन
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।11.4।।
manyase yadi tach chhakyaṁ mayā draṣhṭum iti prabho
yogeśhvara tato me tvaṁ darśhayātmānam avyayam
।।11.4।। हे प्रभो ! मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है -- ऐसा अगर आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर ! आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे दिखा दीजिये।
11.8श्रीकृष्ण
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।।11.8।।
na tu māṁ śhakyase draṣhṭum anenaiva sva-chakṣhuṣhā
divyaṁ dadāmi te chakṣhuḥ paśhya me yogam aiśhwaram
।।11.8।। परन्तु तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता, इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरी ईश्वर-सम्बन्धी सामर्थ्यको देख।
11.9संजय
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।।11.9।।
sañjaya uvācha
evam uktvā tato rājan mahā-yogeśhvaro hariḥ
darśhayām āsa pārthāya paramaṁ rūpam aiśhwaram
।।11.9।। सञ्जय बोले -- हे राजन् ! ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको परम ऐश्वर-रूप दिखाया।
11.47श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।11.47।।
śhrī-bhagavān uvācha
mayā prasannena tavārjunedaṁ
rūpaṁ paraṁ darśhitam ātma-yogāt
tejo-mayaṁ viśhvam anantam ādyaṁ
yan me tvad anyena na dṛiṣhṭa-pūrvam
।।11.47।। श्रीभगवान् बोले -- हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसीने नहीं देखा है।
12.1अर्जुन
अर्जुन उवाचएवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।12.1।।
arjuna uvācha
evaṁ satata-yuktā ye bhaktās tvāṁ paryupāsate
ye chāpy akṣharam avyaktaṁ teṣhāṁ ke yoga-vittamāḥ
।।12.1।।जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप-(सगुण भगवान्-) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
12.2श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाचमय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।12.2।।
śhrī-bhagavān uvācha
mayy āveśhya mano ye māṁ nitya-yuktā upāsate
śhraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ
।।12.2।।मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
12.6श्रीकृष्ण
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ
ananyenaiva yogena māṁ dhyāyanta upāsate
।।12.6।।परन्तु जो कर्मोंको मेरे अर्पण करके और मेरे परायण होकर अनन्ययोगसे मेरा ही ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं।
12.9श्रीकृष्ण
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।12.9।।
atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram
abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya
।।12.9।।अगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।
12.10श्रीकृष्ण
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।
abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava
mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi
।।12.10।।अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।
12.11श्रीकृष्ण
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।12.11।।
athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ
sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān
।।12.11।।अगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।
13.11श्रीकृष्ण
मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।13.11।।
mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī
vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi
।।13.11।।मेरेमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना, एकान्त स्थानमें रहनेका स्वभाव होना और जन-समुदायमें प्रीतिका न होना।
13.25श्रीकृष्ण
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।13.25।।
dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā
anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare
।।13.25।।कई मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा, कई सांख्ययोगके द्वारा और कई कर्मयोगके द्वारा अपने-आपसे अपने-आपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं।
13.27श्रीकृष्ण
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ।।13.27।।
yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam
kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha
।।13.27।।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो।
15.11श्रीकृष्ण
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः।।15.11।।
yatanto yoginaśh chainaṁ paśhyanty ātmany avasthitam
yatanto ‘py akṛitātmāno nainaṁ paśhyanty achetasaḥ
।।15.11।।यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते।
16.1श्रीकृष्ण
श्री भगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
।।16.1।।श्रीभगवान् बोले -- भयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।
16.8श्रीकृष्ण
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।
asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram
aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam
।।16.8।।वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, अप्रतिष्ठित और बिना ईश्वरके अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है। इसलिये काम ही इसका कारण है, और कोई कारण नहीं है।
18.33श्रीकृष्ण
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।18.33।।
dhṛityā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥ
yogenāvyabhichāriṇyā dhṛitiḥ sā pārtha sāttvikī
।।18.33।।हे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
18.57श्रीकृष्ण
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।18.57।।
chetasā sarva-karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ
buddhi-yogam upāśhritya mach-chittaḥ satataṁ bhava
।।18.57।।चित्तसे सम्पूर्ण कर्म मुझमें अर्पण करके, मेरे परायण होकर तथा समताका आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो जा।
18.75संजय
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।18.75।।
vyāsa-prasādāch chhrutavān etad guhyam ahaṁ param
yogaṁ yogeśhvarāt kṛiṣhṇāt sākṣhāt kathayataḥ svayam
।।18.75।।व्यासजीकी कृपासे मैंने स्वयं इस परम गोपनीय योग (गीता-ग्रन्थ) को कहते हुए साक्षात् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे सुना है।
18.78संजय
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।
yatra yogeśhvaraḥ kṛiṣhṇo yatra pārtho dhanur-dharaḥ
tatra śhrīr vijayo bhūtir dhruvā nītir matir mama
।।18.78।।जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।